नई दिल्ली (PaisaKhabar News Desk): इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण विधिक सिद्धांत को प्रतिपादित करते हुए स्पष्ट किया है कि केवल मौखिक दलील के आधार पर किसी तीसरे पक्ष की पात्रता या योग्यता तय नहीं की जा सकती। न्यायमूर्ति की खंडपीठ ने सिंगल जज के उस फैसले को आंशिक रूप से रद्द कर दिया, जिसमें बिना प्रति शपथपत्र (Counter Affidavit) मंगाए और बिना पर्याप्त सुनवाई दिए तथ्यात्मक निष्कर्ष दर्ज किए गए थे। यह मामला नगर एवं ग्राम नियोजन विभाग में चीफ टाउन एंड कंट्री प्लानर के प्रभार से जुड़ा है। अदालत ने राज्य सरकार को छह महीने के भीतर सीनियर प्लानर पद के लिए नियमानुसार विभागीय पदोन्नति समिति (DPC) गठित करने का सख्त निर्देश दिया है।
📌 मुख्य बिंदु (Key Highlights):
- इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि अप्रमाणित मौखिक दलीलों के आधार पर किसी तीसरे पक्ष का पात्रता निर्धारण गैर-कानूनी है।
- अपीलकर्ता अशोक कुमार द्वारा 4 नवंबर 2025 को जारी प्रभार आदेश के खिलाफ दायर याचिका पर खंडपीठ ने दिया अहम आदेश।
- खंडपीठ ने सिंगल जज के 9 दिसंबर 2025 के आदेश को आंशिक रूप से रद्द कर प्रक्रियागत त्रुटि में सुधार किया।
- राज्य सरकार को सीनियर प्लानर पद हेतु उत्तर प्रदेश नगर एवं ग्राम नियोजन सेवा नियम, 1987 के तहत 6 महीने में DPC गठन का निर्देश।
अशोक कुमार याचिका पर इलाहाबाद हाईकोर्ट का निर्णय
इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिकाकर्ता अशोक कुमार ने 4 नवंबर 2025 को जारी उस प्रशासनिक आदेश को चुनौती दी थी, जिसके तहत नगर एवं ग्राम नियोजन विभाग में चीफ टाउन एंड कंट्री प्लानर कार्यवाहक प्रभार एक प्रतिवादी को सौंपा गया था। सिंगल जज द्वारा 9 दिसंबर 2025 को याचिका खारिज किए जाने के बाद यह मामला विशेष अपील के रूप में खंडपीठ के समक्ष आया। खंडपीठ ने पाया कि सुनवाई के दौरान बिना लिखित जवाब या जवाबी हलफनामा दाखिल कराए केवल मौखिक बयानों को आधार बनाकर तीसरे पक्ष की अर्हता पर टिप्पणी कर दी गई थी, जो प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन है।
अदालत ने कहा कि जब तक किसी पक्ष को अपना पक्ष रखने के लिए लिखित हलफनामा दाखिल करने का अवसर नहीं दिया जाता, तब तक उसके अधिकारों या उसकी विधिक पात्रता पर कोई भी प्रतिकूल या अनुकूल निष्कर्ष दर्ज नहीं किया जा सकता। उच्च न्यायालय ने साफ किया कि न्यायिक प्रक्रिया में केवल मौखिक कथनों पर निर्भरता से प्रशासनिक निर्णयों में मनमानी और प्रक्रियागत खामियां उत्पन्न हो सकती हैं, जिन्हें सुधारा जाना अनिवार्य है।
सेवा नियमावली 1987 और AICTE मानदंडों का विश्लेषण
विवादित पदोन्नति और प्रभार प्रक्रिया में उत्तर प्रदेश नगर एवं ग्राम नियोजन सेवा नियम, 1987 (परिशिष्ट 'बी') तथा अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (AICTE) और इन्स्टिट्यूट ऑफ टाउन प्लानर्स, इंडिया के शैक्षणिक व अनुभव संबंधी मानकों का संदर्भ शामिल था। अदालत ने रेखांकित किया किसी भी प्रशासनिक या न्यायिक निर्णय में सेवा नियमों की अनदेखी नहीं की जा सकती। यदि प्रभार या पदोन्नति की प्रक्रिया पर सवाल उठता है, तो उसका समाधान स्थापित नियमों और विभागीय रिकॉर्ड्स की जांच के बाद ही होना चाहिए।
उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने कहा कि प्रशासनिक पदों पर अस्थायी प्रभार देने में पारदर्शी प्रक्रिया का पालन आवश्यक है। बिना तथ्यात्मक सत्यापन और औपचारिक शपथपत्र के किसी तीसरे पक्ष की योग्यता या अयोग्यता तय करना विधिक दृष्टि से टिकाऊ नहीं है। इसी आधार पर खंडपीठ ने 9 दिसंबर 2025 के आदेश के उस हिस्से को रद्द कर दिया जो मौखिक दलीलों के आधार पर तीसरे पक्ष की पात्रता से संबंधित था।
न्यायिक समीक्षा और विभागीय पदोन्नति समिति के आदेश का असर
हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि सीनियर प्लानर के पद पर स्थायी पदोन्नति प्रक्रिया को पूरा करने के लिए अगले छह महीने के भीतर विभागीय पदोन्नति समिति (DPC) का गठन किया जाए। कोर्ट के इस सख्त रुख से यह स्पष्ट हो गया है कि एडहॉक या कार्यवाहक प्रभार की व्यवस्था को अनिश्चितकाल के लिए जारी नहीं रखा जा सकता और नियमित चयन प्रक्रिया को नियमानुसार छह महीने में पूरा करना कानूनी रूप से अनिवार्य होगा।
यह फैसला प्रशासनिक निकायों और निचली अदालतों के लिए एक महत्वपूर्ण नज़ीर पेश करता है। विधिक व्यवस्था में यह सिद्धांत पुनः स्थापित हुआ है कि यदि किसी मामले में तथ्य विवादित हैं या तीसरे पक्ष के अधिकार प्रभावित हो रहे हैं, तो प्रति शपथपत्र (Counter Affidavit) की मांग अनिवार्य की जानी चाहिए ताकि सभी तथ्यों का दस्तावेजी सत्यापन संभव हो सके।
प्रशासकीय एवं विधिक विवादों में शिकायत दर्ज करने की आधिकारिक प्रक्रिया
सेवा मामलों और प्रशासनिक आदेशों के खिलाफ कानूनी राहत पाने के लिए पक्षकारों को स्थापित संवैधानिक और कानूनी प्रक्रिया का पालन करना आवश्यक है:
- चरण 1: प्रशासनिक आदेश के खिलाफ संबंधित विभाग में सेवा नियमावली 1987 के तहत 30 दिनों के भीतर औपचारिक प्रतिनिधित्व दें।
- चरण 2: राहत न मिलने पर भारतीय संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट में रिट याचिका दाखिल करें।
- चरण 3: तथ्यात्मक दावों की पुष्टि के लिए याचिका के साथ प्रमाणित दस्तावेज और शपथपत्र संलग्न करें।
- चरण 4: एकतरफा या मौखिक आदेश से प्रभावित होने पर खंडपीठ के समक्ष विशेष अपील (Special Appeal) दायर करें।