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News • PaisaKhabar Desk • 6 नवंबर 2026 | 07:40 PM IST

Green Finance Taxonomy: ग्रीन फाइनेंस टैक्सोनॉमी की कमी से नेट-जीरो लक्ष्यों को झटका

Green Finance Taxonomy: ग्रीन फाइनेंस टैक्सोनॉमी की कमी से नेट-जीरो लक्ष्यों को झटका

नई दिल्ली (PaisaKhabar News Desk): भारत के महत्वाकांक्षी नेट-जीरो लक्ष्यों को प्राप्त करने की दिशा में एक बड़ी और गंभीर बाधा सामने आ रही है, क्योंकि देश में अभी तक कोई स्पष्ट और व्यापक 'ग्रीन फाइनेंस टैक्सोनॉमी' (Green Finance Taxonomy) लागू नहीं की जा सकी है। बिज़नेस स्टैंडर्ड की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, इस आधिकारिक वर्गीकरण ढांचे की अनुपस्थिति के कारण देश के हरित ऊर्जा संक्रमण के वित्तपोषण में भारी अड़चनें आ रही हैं। हालांकि केंद्रीय मंत्रिमंडल ने हाल ही में ग्रीन एनर्जी ट्रांसमिशन के लिए ₹1.86 लाख करोड़ की भारी-भरकम 'पीएम-धारा' (PM-DHARA) योजना को मंजूरी दी है, लेकिन इसके बावजूद निवेशकों और वित्तीय संस्थानों के सामने यह स्पष्ट नहीं है कि वास्तव में कौन सी परियोजनाएं पूरी तरह 'हरित' या पर्यावरण अनुकूल मानी जाएंगी। इस नीतिगत कमी से न केवल निवेशकों में भ्रम की स्थिति बनी हुई है, बल्कि विदेशी और घरेलू संस्थागत पूंजी के प्रवाह पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है.

📌 मुख्य बिंदु (Key Highlights):

  • ग्रीन फाइनेंस टैक्सोनॉमी की अनुपस्थिति से भारत के 2070 तक के नेट-जीरो लक्ष्यों को गंभीर झटका लग रहा है।
  • केंद्रीय मंत्रिमंडल ने ग्रीन एनर्जी ट्रांसमिशन के लिए हाल ही में ₹1.86 लाख करोड़ की 'पीएम-धारा' योजना को मंजूरी दी है।
  • टैक्सोनॉमी के अभाव में यह तय करना कठिन हो रहा है कि कौन सी परियोजनाएं आधिकारिक रूप से पर्यावरण अनुकूल श्रेणी में आती हैं।
  • स्पष्ट नियमों और वर्गीकरण ढांचे के न होने से विदेशी और घरेलू निवेशकों के बीच पूंजी आवंटन को लेकर असमंजस बना हुआ है।

ग्रीन फाइनेंस टैक्सोनॉमी के अभाव से भारत के नेट-जीरो लक्ष्य प्रभावित

देश में एक स्पष्ट और आधिकारिक ग्रीन फाइनेंस टैक्सोनॉमी के न होने के कारण भारत के दीर्घकालिक नेट-जीरो लक्ष्यों की राह में बड़ी चुनौतियां खड़ी हो रही हैं। वित्तीय बाजारों और पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक यह नियामक ढांचा तैयार नहीं होता, तब तक यह सुनिश्चित करना असंभव है कि हरित बॉन्ड और सस्टेनेबल फाइनेंस के नाम पर आने वाला धन वास्तव में पर्यावरण की दृष्टि से टिकाऊ परियोजनाओं में ही लग रहा है। इस स्पष्टता के अभाव में बैंक और वित्तीय संस्थान जोखिम भरी फंडिंग से बच रहे हैं, जिससे नवीकरणीय ऊर्जा और स्वच्छ तकनीक से जुड़े प्रोजेक्ट्स के लिए पूंजी जुटाना बेहद महंगा और जटिल हो गया है। वैश्विक स्तर पर निवेशकों के बीच 'ग्रीनवाशिंग' (पर्यावरण के अनुकूल होने का झूठा दावा) को लेकर बढ़ती चिंताएं भी इस बात की मांग करती हैं कि भारत सरकार जल्द से जल्द एक पारदर्शी और सख्त वर्गीकरण प्रणाली लागू करे।

इस बीच, देश की ऊर्जा अवसंरचना को मजबूत करने के लिए सरकार ने बड़े कदम उठाए हैं, जिसमें हाल ही में कैबिनेट द्वारा अनुमोदित ₹1.86 लाख करोड़ की विशाल 'पीएम-धारा' (PM-DHARA) योजना शामिल है, जो विशेष रूप से ग्रीन एनर्जी ट्रांसमिशन नेटवर्क को अपग्रेड करने पर केंद्रित है। इसके बावजूद, जब तक विभिन्न उद्योगों, विनिर्माण इकाइयों और ऊर्जा परियोजनाओं के लिए ग्रीन क्लासिफिकेशन के कड़े मानक तय नहीं किए जाते, तब तक निजी क्षेत्र की भागीदारी अपेक्षित गति नहीं पकड़ पाएगी। वित्तीय विश्लेषकों का यह भी कहना है कि इस टैक्सोनॉमी की कमी के कारण भारतीय कंपनियों को अंतरराष्ट्रीय बाजारों में हरित पूंजी हासिल करने के दौरान अतिरिक्त अनुपालन और ऑडिट संबंधी जटिलताओं का सामना करना पड़ रहा है, जो अंततः देश की स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण की गति को धीमा कर रहा है।

पीएम-धारा योजना और हरित ऊर्जा संक्रमण के समक्ष वित्तीय चुनौतियां

केंद्र सरकार द्वारा अनुमोदित ₹1.86 लाख करोड़ की 'पीएम-धारा' योजना देश के ग्रीन एनर्जी ट्रांसमिशन इंफ्रास्ट्रक्चर को एक नया आयाम देने के लिए डिजाइन की गई है, ताकि रिन्यूएबल एनर्जी को ग्रिड के साथ आसानी से जोड़ा जा सके। हालांकि इतनी बड़ी राशि के निवेश के बावजूद, बाजार विशेषज्ञों का तर्क है कि सरकारी वित्तपोषण अकेले निजी क्षेत्र की उन लाखों करोड़ की जरूरतों को पूरा नहीं कर सकता जो भारत को 2030 तक 500 गीगावाट गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता हासिल करने के लिए आवश्यक हैं। जब तक वाणिज्यिक बैंक, नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनियां (NBFC) और अन्य वित्तीय संस्थान हरित वित्तपोषण के लिए एक समान और वैधानिक रूप से स्वीकृत टैक्सोनॉमी का पालन नहीं करते, तब तक ग्रीन बॉन्ड्स और सस्टेनेबल लेंडिंग का बाजार अपनी पूरी क्षमता से काम नहीं कर पाएगा।

वैश्विक निवेशकों और क्लाइमेट फाइनेंस एजेंसियों के लिए यह बेहद जरूरी है कि उन्हें भारत में निवेश के स्पष्ट और पारदर्शी नियम मिलें, ताकि वे बिना किसी कानूनी या विनियामक अनिश्चितता के दीर्घकालिक पूंजी लगा सकें। टैक्सोनॉमी की यह कमी न केवल ऋणदाताओं के लिए जोखिम का स्तर बढ़ाती है, बल्कि उन स्टार्टअप्स और ग्रीन टेक कंपनियों के लिए भी मुश्किलें पैदा करती है जो ऊर्जा दक्षता, इलेक्ट्रिक वाहन बुनियादी ढांचे और सर्कुलर इकोनॉमी के क्षेत्र में काम कर रही हैं। नियामक निकायों और वित्त मंत्रालय के बीच इस बात पर लगातार मंथन चल रहा है कि यूरोपीय यूनियन (EU) और अन्य अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप एक स्वदेशी और व्यावहारिक ग्रीन टैक्सोनॉमी कैसे तैयार की जाए, जो भारतीय अर्थव्यवस्था की विशिष्ट प्राथमिकताओं और विकास की जरूरतों के अनुकूल हो।

नियामक स्पष्टता और निवेशकों के बीच पूंजी प्रवाह का गहन विश्लेषण

एक स्पष्ट ग्रीन फाइनेंस टैक्सोनॉमी का न होना केवल पर्यावरण नीति का मामला नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर देश की वित्तीय स्थिरता और निवेशकों के विश्वास से जुड़ा हुआ है। जब तक वित्तीय क्षेत्र के नियामकों जैसे कि भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) और भारतीय प्रतिभूति विनिमय बोर्ड (SEBI) द्वारा हरित गतिविधियों की कोई आधिकारिक सूची जारी नहीं की जाती, तब तक बाजार में भ्रामक दावों और अनियंत्रित ग्रीन बॉन्ड जारी करने की प्रवृत्ति बनी रह सकती है। इससे संस्थागत निवेशकों का एक बड़ा वर्ग पीछे हट रहा है जो सख्त पर्यावरण, सामाजिक और शासन (ESG) मानदंडों का पालन करने के लिए बाध्य है। यह नीतिगत अंतराल भारत की उस वैश्विक प्रतिबद्धता को भी प्रभावित कर रहा है जिसके तहत देश ने COP26 और उसके बाद के सम्मेलनों में अपनी जलवायु कार्रवाई की रूपरेखा प्रस्तुत की थी।

दूसरी ओर, पारंपरिक ऋण बाजारों में भी हरित परियोजनाओं के लिए विशेष रियायती ब्याज दरों या तरलता सहायता का अभाव देखा जा रहा है, क्योंकि बैंकों के पास यह परखने का कोई आधिकारिक पैमाना नहीं है कि कौन सा ऋण वास्तव में 'हरित' है। यदि सरकार जल्द ही इस दिशा में कोई ठोस कदम उठाते हुए एक व्यापक टैक्सोनॉमी को अधिसूचित करती है, तो इससे घरेलू और विदेशी पूंजी का एक बड़ा प्रवाह स्वच्छ ऊर्जा, हरित भवन निर्माण और संधारणीय कृषि की ओर डायवर्ट हो सकेगा। इससे न केवल देश के कार्बन उत्सर्जन में कमी आएगी, बल्कि रोजगार के नए अवसर भी सृजित होंगे और भारत वैश्विक ग्रीन फाइनेंस के नक्शे पर एक प्रमुख और भरोसेमंद निवेश गंतव्य के रूप में उभर सकेगा।

हरित वित्तपोषण और नीतिगत अनुपालन सुनिश्चित करने की आधिकारिक प्रक्रिया

भारत में हरित वित्तपोषण से जुड़ी चुनौतियों और भावी अनुपालन को सुचारूप से आगे बढ़ाने के लिए एक स्पष्ट और चरणबद्ध प्रशासनिक रणनीति अपनाने की आवश्यकता है। वित्तीय संस्थानों और कॉरपोरेट जगत को सरकार द्वारा निर्धारित दिशा-निर्देशों के तहत अपनी परियोजनाओं का मूल्यांकन करना होगा ताकि भविष्य के विनियामक बदलावों से बचा जा सके।

  • अधिकारियों और निवेशकों के लिए अनुपालन के प्रमुख चरण निम्नलिखित हैं:
  • चरण 2: 1. वित्त मंत्रालय और पर्यावरण मंत्रालय द्वारा प्रस्तावित ग्रीन टैक्सोनॉमी ड्राफ्ट और दिशा-निर्देशों का सूक्ष्मता से अध्ययन करना।
  • चरण 3: 2. अपनी सभी जारी और आगामी परियोजनाओं के कार्बन पदचिह्न (Carbon Footprint) का स्वतंत्र तृतीय-पक्ष ऑडिट कराना।
  • चरण 4: 3. ग्रीन बॉन्ड या सस्टेनेबिलिटी-लिंक्ड लोन जारी करते समय SEBI और RBI के नवीनतम प्रकटीकरण मानदंडों का पूर्ण पालन करना।
  • चरण 5: 4. ₹1.86 लाख करोड़ की 'पीएम-धारा' जैसी योजनाओं और सरकारी पहलों के तहत मिलने वाले हरित वित्तपोषण अवसरों के लिए समय पर आवेदन करना।
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यह विश्लेषण PaisaKhabar Financial Research Desk द्वारा आधिकारिक सरकारी अधिसूचनाओं, RBI/SEBI/IRDAI दिशानिर्देशों और बाजार के प्रमाणित आंकड़ों के आधार पर तैयार किया गया है। यह लेख केवल वित्तीय जागरूकता और शैक्षिक जानकारी के लिए है; किसी भी निवेश या बीमा निर्णय से पूर्व अपने SEBI-पंजीकृत वित्तीय सलाहकार से परामर्श अवश्य लें।

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