नई दिल्ली (PaisaKhabar News Desk): भारत और अमेरिका के बीच द्विपक्षीय व्यापार समझौते को लेकर डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन के दौरान चली लंबी बातचीत बेनतीजा रहने के पीछे अविश्वास और अनपेक्षित शर्तें मुख्य वजह बनकर उभरी हैं। आधिकारिक सूत्रों और इनसाइड रिपोर्ट के अनुसार वार्ता के दौरान अमेरिकी पक्ष की ओर से अंतिम क्षणों में अतिरिक्त टैरिफ रियायतों और कृषि व डेयरी क्षेत्र को पूरी तरह खोलने का असामान्य दबाव बनाया गया। भारत ने घरेलू किसानों और एमएसएमई सेक्टर के संप्रभु हितों से समझौता करने से साफ इनकार कर दिया जिसके चलते दोनों देशों के बीच तैयार मिनी ट्रेड डील औपचारिक रूप से रुक गई।
📌 मुख्य बिंदु (Key Highlights):
- ट्रंप प्रशासन के दौरान अमेरिकी कृषि व डेयरी उत्पादों पर टैरिफ शून्य करने की अनुचित मांग से वार्ता बाधित हुई।
- भारत ने घरेलू दुग्ध उत्पादकों और करोड़ों किसानों के हितों की रक्षा के लिए विदेशी दखल को अस्वीकार किया।
- अमेरिका द्वारा जनरलाइज्ड सिस्टम ऑफ प्रेफरेंसेस यानी GSP दर्जा वापस लेने से 6 अरब डॉलर का निर्यात प्रभावित हुआ था।
- अंतिम चरण में पहुंची सीमित व्यापार डील पर अमेरिकी वार्ताकारों के बार-बार बदलते रुख ने गंभीर गतिरोध पैदा किया।
ट्रंप प्रशासन की असामान्य शर्तें और वार्ता में बढ़ता गंभीर गतिरोध
भारत और अमेरिका के बीच लंबे समय से लंबित द्विपक्षीय व्यापार समझौते को अंतिम रूप देने के लिए कई दौर की उच्चस्तरीय कूटनीतिक चर्चाएं आयोजित की गई थीं। वाणिज्य मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों के अनुसार वार्ता के अंतिम प्रारूप में दोनों पक्ष कई गैर-विवादित व्यापारिक रियायतों पर सहमत हो चुके थे। हालांकि बातचीत के निर्णायक मोड़ पर पहुंचते ही तत्कालीन ट्रंप प्रशासन ने अमेरिकी कृषि उत्पादों, जेनेटिकली मॉडिफाइड फसलों और डेयरी उत्पादों के लिए भारतीय बाजार को बिना किसी सुरक्षात्मक शुल्क के खोलने की कड़ी शर्त रख दी।
भारतीय वार्ताकारों ने स्पष्ट किया कि ग्रामीण आजीविका से जुड़े संवेदनशील कृषि और पोल्ट्री सेक्टर को अनियंत्रित विदेशी प्रतिस्पर्धा के हवाले नहीं किया जा सकता। इसके अतिरिक्त चिकित्सा उपकरणों पर मूल्य नियंत्रण हटाने और डिजिटल टैक्स को पूरी तरह समाप्त करने का एकतरफा दबाव भी बनाया जा रहा था। अमेरिकी वार्ताकारों के इस अप्रत्याशित और आक्रामक रुख ने दोनों पक्षों के बीच आपसी विश्वास को भारी नुकसान पहुंचाया, जिसके कारण हस्ताक्षर के बेहद करीब पहुंच चुका मिनी ट्रेड समझौता अंततः ठंडे बस्ते में चला गया।
जीएसपी दर्जा समाप्त होने से उपजा गहरा अविश्वास और रणनीतिक मतभेद
द्विपक्षीय संबंधों में पहला बड़ा झटका तब लगा जब ट्रंप प्रशासन ने वर्ष 2019 में भारत का जनरलाइज्ड सिस्टम ऑफ प्रेफरेंसेस यानी GSP बेनेफिशियरी दर्जा एकतरफा तरीके से रद्द कर दिया। इस दंडात्मक कदम से भारत के लगभग 6 अरब डॉलर मूल्य के शुल्क-मुक्त निर्यात पर सीधा असर पड़ा, जिसमें ऑटो पार्ट्स, इंजीनियरिंग उत्पाद और फार्मास्यूटिकल्स शामिल थे। भारत ने इसके जवाब में 28 अमेरिकी उत्पादों पर जवाबी टैरिफ लगाकर अपनी मजबूत आर्थिक स्थिति का संदेश दिया था।
ट्रेड डिप्लोमेसी के विश्लेषकों का मानना है कि ट्रंप की 'अमेरिका फर्स्ट' नीति के तहत अन्य साझेदारों की संप्रभु नीतिगत प्राथमिकताओं की लगातार अनदेखी की गई। स्टील और एल्युमिनियम पर लगाए गए वैश्विक टैरिफ के बाद भारत को सुरक्षात्मक कदम उठाने पर मजबूर होना पड़ा। व्यापार वार्ता के दौरान अमेरिकी पक्ष द्वारा हर बैठक में नए नियम और अप्रत्याशित शर्तें जोड़ने की प्रवृत्ति ने स्पष्ट कर दिया कि यह वार्ता पारस्परिक लाभ के बजाय एकतरफा दबाव बनाने का जरिया बन चुकी थी।
कृषि व डेटा संप्रभुता पर भारत का अडिग रुख और वैश्विक सबक
भारत ने हमेशा यह सिद्धांत बनाए रखा है कि व्यापारिक सौदों में घरेलू खाद्य सुरक्षा और छोटे व्यापारियों की सुरक्षा से कोई समझौता नहीं किया जा सकता। अमेरिका की मांग थी कि धार्मिक और सांस्कृतिक संवेदनशीलता वाले डेयरी आयात पर लगाए गए कड़े प्रमाणीकरण नियमों को शिथिल किया जाए, जिसे भारत ने सिरे से खारिज कर दिया। इसके अलावा भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा अनिवार्य किए गए वित्तीय डेटा लोकलाइजेशन नियमों को भी अमेरिकी बहुराष्ट्रीय टेक कंपनियों के दबाव में हटाने की मांग की गई थी।
वैश्विक व्यापार विशेषज्ञ बताते हैं कि कनाडा और मेक्सिको जैसे निकटतम सहयोगियों पर भी ट्रंप काल में इसी प्रकार का भारी टैरिफ दबाव डाला गया था। हालिया कनाडाई बयानों ने भी पुष्टि की है कि दशकों पुरानी व्यापार व्यवस्था को अमेरिकी नीतियों ने गहरे संकट में डाला था। भारत ने समय रहते अपने सामरिक और आर्थिक हितों की रक्षा करते हुए किसी भी ऐसे बाध्यकारी समझौते पर हस्ताक्षर करने से परहेज किया जो दीर्घकाल में देश के विनिर्माण और स्थानीय रोजगार तंत्र को क्षति पहुंचा सकता था।
द्विपक्षीय व्यापार बाधाओं के समाधान हेतु रणनीतिक कूटनीति के 4 चरण
भविष्य में अमेरिकी नेतृत्व के साथ व्यापार वार्ताओं को संतुलित और परिणामोन्मुखी बनाने के लिए भारत एक बहुआयामी कूटनीतिक रोडमैप का पालन कर रहा है। घरेलू उद्योगों और संवेदनशील कृषि क्षेत्रों के हितों की रक्षा करते हुए आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत करना इस रणनीति का मुख्य आधार है।
- आपूर्ति श्रृंखला साझेदारी: क्रिटिकल मिनरल्स और हाई-टेक सेमीकंडक्टर निर्माण में 100% रणनीतिक सहयोग का विस्तार।
- टैरिफ विवाद निपटारा: WTO मंच पर परस्पर सहमति से लंबित विवादों को द्विपक्षीय समझौतों के माध्यम से सुलझाना।
- गैर-टैरिफ बाधाओं की समीक्षा: भारतीय फार्मा और कृषि निर्यात के लिए अमेरिकी FDA और सुरक्षा मानकों को सुगम बनाना।
- संतुलित बाजार पहुंच: घरेलू डेयरी और MSME को सुरक्षित रखते हुए ऊर्जा और एविएशन सेक्टर में 2-तरफा व्यापार बढ़ाना।