नई दिल्ली (PaisaKhabar News Desk): भारत में पैतृक या विरासत में मिली संपत्ति को प्राप्त करना केवल एक भावनात्मक पल नहीं है, बल्कि यह बेहद संवेदनशील कानूनी और वित्तीय प्रक्रियाओं से जुड़ा विषय है। उत्तराधिकारियों के लिए नामांकित व्यक्ति (Nominee) बनने से लेकर संपत्ति के म्यूटेशन (Mutation), पंजीकरण और आयकर नियमों का अनुपालन करना बेहद अनिवार्य होता है। हाल ही में आईटीएटी (ITAT) के फैसलों और संपत्ति बिक्री पर आयकर विभाग के सख्त रुख ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वसीयत या उत्तराधिकार के तहत मिली अचल संपत्ति के दस्तावेज दुरुस्त रखना कितना आवश्यक है। कानूनन केवल नॉमिनी होना संपत्ति का पूर्ण मालिकाना हक प्रदान नहीं करता है।
📌 मुख्य बिंदु (Key Highlights):
- 1956 के हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम और 2005 के संशोधन के तहत बेटों और बेटियों को पैतृक संपत्ति में समान कानूनी अधिकार प्राप्त हैं।
- नॉमिनी केवल संपत्ति का संरक्षक (Trustee) होता है; अंतिम कानूनी मालिकाना हक वसीयत या उत्तराधिकार कानून के तहत निर्धारित होता है।
- स्थानीय निकाय (Municipal Corporation) में म्यूटेशन (दाखिल-खारिज) कराए बिना विरासत में मिले घर को कानूनी रूप से बेचना या स्थानांतरित करना संभव नहीं है।
- विरासत में मिले घर को बेचते समय मूल खरीदार की खरीद लागत (Cost of Acquisition) और इंडेक्सेशन लाभ के आधार पर कैपिटल गेन्स टैक्स की गणना की जाती है।
विरासत में मिली संपत्ति और कानूनी मालिकाना हक के मूलभूत नियम
भारत में वसीयत (Will) के माध्यम से या बिना वसीयत (Intestate Succession) के विरासत में मिलने वाली संपत्ति के लिए कानूनी प्रक्रिया अलग-अलग होती है। यदि मृतक व्यक्ति ने कोई कानूनी वसीयत छोड़ी है, तो उसकी प्रोबेट (Probate) प्रक्रिया अदालत के माध्यम से पूरी की जाती है। यदि कोई वसीयत मौजूद नहीं है, तो उत्तराधिकार कानून के तहत संपत्ति कानूनी वारिसों में विभाजित की जाती है। आम धारणा के विपरीत, बैंक खातों या अचल संपत्ति में नॉमिनी (Nominee) बनने से व्यक्ति केवल एक कस्टोडियन या ट्रस्टी बनता है, न कि संपत्ति का एकमात्र कानूनी मालिक। वास्तविक स्वामित्व हमेशा वैध वारिसों के पास ही रहता है।
1956 के हिंदू उत्तराधिकार कानून में वर्ष 2005 में हुए ऐतिहासिक संशोधन ने पैतृक संपत्ति पर महिलाओं के अधिकारों में व्यापक परिवर्तन किया। इसके तहत बेटियों को बेटों के समान सह-दायाद (Coparcener) का पूर्ण अधिकार दिया गया। यदि विरासत में मिले घर में कई कानूनी वारिस शामिल हैं, तो किसी भी प्रकार के हस्तांतरण, बिक्री या विभाजन के लिए सभी वारिसों की लिखित सहमति और अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) आवश्यक होता है। बिना सभी वारिसों के निष्पादन के किया गया कोई भी सौदा कानूनी रूप से अमान्य हो सकता है और अदालत में चुनौती योग्य रहता है।
1956 का उत्तराधिकार अधिनियम, 2005 संशोधन और अदालती नज़ीर
पैतृक संपत्ति के कानूनी ढाँचे में 1956 के कानून के बाद 2005 का संशोधन सबसे बड़ा मील का पत्थर रहा है। इसके तहत बेटियों को जन्म से ही कोपार्सनर माना गया है, चाहे उनके पिता का निधन 2005 से पहले ही क्यों न हुआ हो। सर्वोच्च न्यायालय ने विनीता शर्मा बनाम राकेश शर्मा (2020) के ऐतिहासिक फैसले में यह स्पष्ट कर दिया था कि यह अधिकार जन्मसिद्ध है और इसे पूर्व की किसी समयसीमा में नहीं बाँधा जा सकता। कानूनी वारिसों को संपत्ति पर अपना दावा मजबूत करने के लिए उत्तराधिकार प्रमाण पत्र (Succession Certificate) या कानूनी वारिस प्रमाण पत्र (Legal Heir Certificate) प्राप्त करना होता है।
संपत्ति के आधिकारिक हस्तांतरण के लिए राजस्व रिकॉर्ड में म्यूटेशन या दाखिल-खारिज (Mutation) कराना अनिवार्य कानूनी कदम है। म्यूटेशन सरकारी रिकॉर्ड में कर दायित्व और स्वामित्व के परिवर्तन का रिकॉर्ड होता है, यद्यपि यह अपने आप में टाइटल डीड का विकल्प नहीं है। यदि वसीयत पर कोई विवाद उत्पन्न होता है, तो संबंधित पक्ष सिविल कोर्ट में पार्टीशन सूट (Partition Suit) या घोषणात्मक वाद (Declaratory Suit) दायर कर सकते हैं। कानूनी स्पष्टता के अभाव में विरासत में मिली संपत्तियां वर्षों तक न्यायिक विवादों और अदालती स्थगनादेश में उलझी रह सकती हैं।
कैपिटल गेन्स टैक्स, इंडेक्सेशन लाभ और आयकर विभाग के अनुपालन नियम
विरासत में घर प्राप्त करने पर सीधे तौर पर कोई उत्तराधिकार कर (Inheritance Tax) भारत में नहीं लगता है, क्योंकि इसे 1985 में समाप्त कर दिया गया था। हालाँकि, यदि उत्तराधिकारी विरासत में मिले घर को बेचने का फैसला करता है, तो आयकर अधिनियम की धारा 45 के तहत उस पर कैपिटल गेन्स टैक्स लागू होता है। यदि घर 24 महीने से अधिक समय तक होल्ड किया गया है, तो इसे लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन्स (LTCG) माना जाएगा। संपत्ति की खरीद लागत (Cost of Acquisition) वही मानी जाती है जिस पर मूल मालिक (मृतक) ने इसे खरीदा था, और इसी आधार पर इंडेक्सेशन लाभ का निर्धारण होता है।
आयकर विभाग अब संपत्ति बिक्री के सौदों पर कड़ी नजर रख रहा है। आयकर अपीलीय न्यायाधिकरण (ITAT) और कर अधिकारियों के अनुसार, सेल डीड में दर्ज वास्तविक बिक्री मूल्य (Sale Consideration) और स्टाम्प ड्यूटी वैल्यू के बीच अंतर होने पर आयकर अधिनियम की धारा 50C के तहत कार्रवाई की जा सकती है। उत्तराधिकारियों को संपत्ति की बिक्री से प्राप्त राशि पर धारा 54 के तहत आवासीय संपत्ति में पुनर्निवेश करके या धारा 54EC के तहत कैपिटल गेन्स बॉन्ड्स (जैसे NHAI या REC) में 50 लाख रुपये तक निवेश करके कर छूट प्राप्त करने का वैधानिक अवसर मिलता है।
विरासत में मिले घर कानूनी हस्तांतरण कराने की आधिकारिक प्रक्रिया
यदि आपको विरासत में कोई संपत्ति या घर प्राप्त हुआ है, तो भविष्य में होने वाले कानूनी विवादों और कर संबंधी नोटिसों से बचने के लिए उत्तराधिकारियों को एक क्रमबद्ध अनुपालन प्रक्रिया का पालन करना चाहिए। नगर निगम और सब-रजिस्ट्रार कार्यालय के साथ समन्वय स्थापित करके रिकॉर्ड अपडेट करना प्राथमिक आवश्यकता है।
- चरण 1: तहसीलदार या नगर निगम कार्यालय से आधिकारिक कानूनी वारिस प्रमाण पत्र (Legal Heir Certificate) प्राप्त करें।
- चरण 2: सक्षम सिविल कोर्ट से वसीयत का प्रोबेट प्रमाणित कराएं और सभी वारिसों से रिलीज डीड या NOC निष्पादित करें।
- चरण 3: स्थानीय राजस्व कार्यालय में म्यूटेशन (दाखिल-खारिज) का आवेदन जमा करके संपत्ति कर का रसीद अपने नाम दर्ज कराएं।
- चरण 4: संपत्ति बिक्री की स्थिति में आयकर अधिनियम की धारा 54 या 54EC के तहत कर छूट पाने हेतु आयकर रिटर्न (ITR) सही से भरें।